श्री प्राप्ति के लिए शास्त्र एवं परम्पराओं के अनुकुल आचरण करना आवश्यक है। आर्यावर्त (जम्बुद्धीप) या कहे आज का दक्षिण एसिया इसलिए कंगाल है क्यो कि हम शास्त्रों के निर्देशो का पालन नही कर रहे है। हमारे यहाँ अमीर भी कंगाल जैसा हीं है। अगर हम सामुहिक रुप से शास्त्रो के निर्देशों के अनुकुल आचरण करें तो कोई कारण नही की हमारा देश समृद्ध एवं सुखी नही बन सकता। शास्त्रों में यह बात बहुत स्पष्ट रुप से कही गई है कि स्वर्ण मे कलि का वास होता है। कलि दुषित है एवं सत्य के विपरीत भी है। अतः अपने पास स्वर्ण रखना शास्त्र के प्रतिकुल है।
हिरण्यकश्यप का अर्थ सोने का राक्षस होता है। अगर कोई व्यक्ति अपने पास एक रती भी सोना रखता है तो उसे गो-हत्या के आघे का पाप चढता है। अगर आप व्यक्तिगत एवं राष्ट्रिय समृद्धि चाहते है तो अविलम्ब अपने पास रखे स्वर्ण एवं उससे बने आभुषण आदि बेच डाले। बेच कर प्राप्त होने बाले धन का निवेश रोजगार, उद्योग, शेयर अथवा स्वदेशी बैंक में करें। यही मुक्ति का मार्ग है यही स्वराज्य का रास्ता भी है।
इतनी ऊँची इसकी चोटी कि सकल धरती का ताज यही। पर्वत-पहाड़ से भरी धरा पर केवल पर्वतराज यही। अंबर में सिर, पाताल चरण है । मन इसका गंगा का बचपन है। इस हिमालय की गोद मे बसा देश नेपाल । भारत और नेपाल के लोगो के बीच विशेष प्रकार के सम्बन्ध है । सरकारेँ या मिडिया इस विशेष प्रकार के रिश्ते को समझ पाने मे असमर्थ रही है । यह एक कोशिश है नेपाल की वास्तविकताओ को आप तक पहुँचाने की . . . . . . .
Monday, February 8, 2010
Monday, December 1, 2008
दक्षिण एसिया मे आतंकवाद का समाधान नही चाहते है शक्ति सम्पन्न राष्ट्र
मुम्बई हादसे ने सहसा स्तब्ध सा कर दिया -संवेदनाओं को झिझोड़ कर रख दिया -कुछ ना कर पाने के हताशाजन आक्रोश -पीडा ने गुमसुम और मौन सा कर दिया ! कुछ ऐसी ही स्थितियां कभी कभी मनुष्य में आत्मघाती प्रवृत्तियों को
उकसाती हैं -एक तरह के सेल्फ अग्रेसन के भाव को भी ! एक राष्ट्र के रूप में दक्षिण एसिया के राष्ट्र कितने नकारा हो गए हैं - चन्द आतंकवादी सारे सुरक्षा स्तरों को सहज ही पार कर हमारी प्रभुसत्ता पर सहसा टूट पड़ते है और हम जग हसाई के पात्र बन जाते हैं ! नेपाल मे भी देखे तो शक्ति सम्पन्न राष्ट्रो की मदत से देशद्रोही माओवादीयो ने राष्ट्र की सत्ता पर ही कब्जा
जमा लिया है।
क्या इतिहास ख़ुद को दुहरा रहा है ? क्या हम अपने अतीत से सबक नही ले पाये और आज तक काहिलियत ,अकर्मण्यता और बेपरवाह से बने हैं -एक समय था जब हमारी हिन्दु भुमियो को जब भी जिस विदेशी आक्रान्ता ने चाहा चन्द अरबी
घोडों पे सवार हो अपने छोटे से दल के साथ यहाँ पहुचा और हमारे स्वाभिमान को रौंद, लूट खसोट कर वापस लौट गया ! मुम्बई की घटना में कया कही कुछ अन्तर नजर आता है -हम आज भी वैसे ही असहाय नजर आए और सारी दुनिया हमारी
बेबसी को देखती रही ।
हिन्दुत्व कभी भी एक संगठीत धर्म नही रहा है। यह एक जीवन पद्धति और बहुलवादी विचारधारा रही है। इस्लाम की तरह कोई सर्वसतावादी विचारधारा का मार्ग हमने नही अपनाया। हम विचारो की विविधता, जातियो की विविधता और पुजा पद्धतियो की विविधता को हर्ष पुर्वक स्वीकार करते है। लेकिन इसलाम ने धर्म का प्रयोग साम्राज्यवादी औजार के रुप मे किया। हमारी भुमि का हमारा अपना भाई जिसने विगत मे किसी परिस्थीती के कारण या दवाबवश इस्लाम अपनाया उस की राष्ट्रीय आस्था भी बदल गई। वह अपनी इस पुर्वजो की भुमि से ज्यादा मोहब्बत अपने पैगम्बर की भुमि से करने लगा। वह हकिकत को भुल कर उस छलावे को सही मान बैठा। जब तक भारत और पाकिस्तान के मुसल्मान यह नही सम्झेगें की यह उनकी पुर्वजो की भुमि है और हम उनके अपने भाई है तब तक आतंकवाद की समस्या का समाधान नही है। या फिर हमे हिन्दुत्व को भी संगठीत धर्म बनाना होगा, लेकिन तब वह इस विश्व की एक बहुत हीं सुन्दर जीवन पद्धति का अंत होगा। दुर्घटना होगी।
हिन्दु-मुस्लमान मे मित्रता के लिए हमने क्या नही किया। मुसल्मानो ने अपने लिए अलग देश ले लिया फिर भी हम उन्हे अपनी भुमि पर रहने देते रहे की उनका हृदय परिवर्तन होगा। आज भी मुझे विश्वास है की वह हमे जरुर अपनाएंगें। दक्षिण एसिया मे स्थायी शांती के लिए क्या किया जा सकता है यह सोचना ही होगा।
(कुछ अंश अन्य ब्लग से साभार)
उकसाती हैं -एक तरह के सेल्फ अग्रेसन के भाव को भी ! एक राष्ट्र के रूप में दक्षिण एसिया के राष्ट्र कितने नकारा हो गए हैं - चन्द आतंकवादी सारे सुरक्षा स्तरों को सहज ही पार कर हमारी प्रभुसत्ता पर सहसा टूट पड़ते है और हम जग हसाई के पात्र बन जाते हैं ! नेपाल मे भी देखे तो शक्ति सम्पन्न राष्ट्रो की मदत से देशद्रोही माओवादीयो ने राष्ट्र की सत्ता पर ही कब्जा
जमा लिया है।
क्या इतिहास ख़ुद को दुहरा रहा है ? क्या हम अपने अतीत से सबक नही ले पाये और आज तक काहिलियत ,अकर्मण्यता और बेपरवाह से बने हैं -एक समय था जब हमारी हिन्दु भुमियो को जब भी जिस विदेशी आक्रान्ता ने चाहा चन्द अरबी
घोडों पे सवार हो अपने छोटे से दल के साथ यहाँ पहुचा और हमारे स्वाभिमान को रौंद, लूट खसोट कर वापस लौट गया ! मुम्बई की घटना में कया कही कुछ अन्तर नजर आता है -हम आज भी वैसे ही असहाय नजर आए और सारी दुनिया हमारी
बेबसी को देखती रही ।
हिन्दुत्व कभी भी एक संगठीत धर्म नही रहा है। यह एक जीवन पद्धति और बहुलवादी विचारधारा रही है। इस्लाम की तरह कोई सर्वसतावादी विचारधारा का मार्ग हमने नही अपनाया। हम विचारो की विविधता, जातियो की विविधता और पुजा पद्धतियो की विविधता को हर्ष पुर्वक स्वीकार करते है। लेकिन इसलाम ने धर्म का प्रयोग साम्राज्यवादी औजार के रुप मे किया। हमारी भुमि का हमारा अपना भाई जिसने विगत मे किसी परिस्थीती के कारण या दवाबवश इस्लाम अपनाया उस की राष्ट्रीय आस्था भी बदल गई। वह अपनी इस पुर्वजो की भुमि से ज्यादा मोहब्बत अपने पैगम्बर की भुमि से करने लगा। वह हकिकत को भुल कर उस छलावे को सही मान बैठा। जब तक भारत और पाकिस्तान के मुसल्मान यह नही सम्झेगें की यह उनकी पुर्वजो की भुमि है और हम उनके अपने भाई है तब तक आतंकवाद की समस्या का समाधान नही है। या फिर हमे हिन्दुत्व को भी संगठीत धर्म बनाना होगा, लेकिन तब वह इस विश्व की एक बहुत हीं सुन्दर जीवन पद्धति का अंत होगा। दुर्घटना होगी।
हिन्दु-मुस्लमान मे मित्रता के लिए हमने क्या नही किया। मुसल्मानो ने अपने लिए अलग देश ले लिया फिर भी हम उन्हे अपनी भुमि पर रहने देते रहे की उनका हृदय परिवर्तन होगा। आज भी मुझे विश्वास है की वह हमे जरुर अपनाएंगें। दक्षिण एसिया मे स्थायी शांती के लिए क्या किया जा सकता है यह सोचना ही होगा।
(कुछ अंश अन्य ब्लग से साभार)
मुम्बई मे 4817 बचे है मुर्ख ...........
भारत के विशेष गृह सचिव एम.एल कुमावत कह रहे थे की 183 लोग मुम्बई के हमले मे मारे गए। दुसरी तरफ महाराष्ट्र के गृह मंत्री आर.आर.पाटिल कह रहे थे की 4817 लोग बचा लिए गए क्योकी वह 5000 को मारने के लिए आए थे। लेकिन
मै कहता हुं की सिर्फ 19 मरे जो अपनी जान न्योछावर कर दुश्मनो से लडते लडते भारत माता की रक्षा के लिए शहीद हो गए। मै अपनी गिनती मे हेमंत करकरे जैसे लोगो को नही लेता हुं क्योकी वे क्या मरेगे जो पहले से ही मरे हुए है। हेमंत करकरे को नरेन्द्र मोदी और भारत की मिडिया देश का नायक और शहीद बनाने पर तुली हुइ है।
किसी पुलिस अफसर के लिए एक निर्दोष साध्वी के उपर झुठा आतंकवाद का आरोप लगाकर प्रताडीत करना आसान होता है । लेकिन जब असली दहशतगर्द आतंकवादी से आमना-सामना होता है तब उसकी बहादुरी की असली परीक्षा होती है ।
प्राप्त जानकारीयों के अनुसार हेमंत करकरे की मौत आतंकवादीयों से लडते हुए नही हुइ थी। वह ठीक उसी तरह मरे जीस तरह मुर्म्बई में पौने दो सौ आम शहरी मरे थें । एक कार में वह अपने घायल साथी को देखने के लिए कामा हास्पीटल जा रहे थे। सम्भवतः वह उस वक्त ड्युटी पर भी नही थे क्योकी उनके पास न तो बुलेट-प्रुफ जैकेट थी ना ही बडा स्वचलित हतियार। संयोगवश आतंकीयों ने इन पर हमला किया और वह मारे गए। आतंकीयो ने हेमंत करकरे की लाश घसीट कर बाहर रखी और उसी कार मे बैंठ आतंकीयों ने सैकडो लागो को मौत के घाट उतारा था । हेमंत करकरे ने कोई बहादुरी नही दिखाई और बिलकुल आम आदमी की तरह आतंकीयो पर विना किसी जबाबी हमले किए मारे गए। टेलिवीजन ने हेल्मेट पहनते और बुलेटप्रुफ जैकेट पहनते जो हेमंत करकरे की तस्वीर दिखा रही है वह पहले की फाइल क्लीपींग है, हाल की मुम्बई घटना से उसका कोई लेना देना नही है। क्या इन्हे बहादुर शहीद कहना उचित है।
हमारे यहां यह परम्परा रही है की मरने के बाद हम लोगों के गुण याद रखते हैं तथा अवगुणो को भुलने की कोशीश करते है । इस नाते कोई हेमंत करकरे को शहीद कहे तो चलो ठीक है।
मेजर उन्नीकृष्णन तथा हवलदार गजेन्द्र सिंह जैसे वीरो ने लडते लडते मां भारती की लाज बचाने के लिए मौत को अपने गले लगा लिया था। उनके लिए मेरे जिस्म का रोआं रोआं कृतज्ञ है। मै मुंबई की आतंकी घटना मे शहीद हुए उन 19 बहादुर सिपाहियो के प्रति हार्दिक श्रद्धांजली अर्पित करता हुं।
मै कहता हुं की सिर्फ 19 मरे जो अपनी जान न्योछावर कर दुश्मनो से लडते लडते भारत माता की रक्षा के लिए शहीद हो गए। मै अपनी गिनती मे हेमंत करकरे जैसे लोगो को नही लेता हुं क्योकी वे क्या मरेगे जो पहले से ही मरे हुए है। हेमंत करकरे को नरेन्द्र मोदी और भारत की मिडिया देश का नायक और शहीद बनाने पर तुली हुइ है।
किसी पुलिस अफसर के लिए एक निर्दोष साध्वी के उपर झुठा आतंकवाद का आरोप लगाकर प्रताडीत करना आसान होता है । लेकिन जब असली दहशतगर्द आतंकवादी से आमना-सामना होता है तब उसकी बहादुरी की असली परीक्षा होती है ।
प्राप्त जानकारीयों के अनुसार हेमंत करकरे की मौत आतंकवादीयों से लडते हुए नही हुइ थी। वह ठीक उसी तरह मरे जीस तरह मुर्म्बई में पौने दो सौ आम शहरी मरे थें । एक कार में वह अपने घायल साथी को देखने के लिए कामा हास्पीटल जा रहे थे। सम्भवतः वह उस वक्त ड्युटी पर भी नही थे क्योकी उनके पास न तो बुलेट-प्रुफ जैकेट थी ना ही बडा स्वचलित हतियार। संयोगवश आतंकीयों ने इन पर हमला किया और वह मारे गए। आतंकीयो ने हेमंत करकरे की लाश घसीट कर बाहर रखी और उसी कार मे बैंठ आतंकीयों ने सैकडो लागो को मौत के घाट उतारा था । हेमंत करकरे ने कोई बहादुरी नही दिखाई और बिलकुल आम आदमी की तरह आतंकीयो पर विना किसी जबाबी हमले किए मारे गए। टेलिवीजन ने हेल्मेट पहनते और बुलेटप्रुफ जैकेट पहनते जो हेमंत करकरे की तस्वीर दिखा रही है वह पहले की फाइल क्लीपींग है, हाल की मुम्बई घटना से उसका कोई लेना देना नही है। क्या इन्हे बहादुर शहीद कहना उचित है।
हमारे यहां यह परम्परा रही है की मरने के बाद हम लोगों के गुण याद रखते हैं तथा अवगुणो को भुलने की कोशीश करते है । इस नाते कोई हेमंत करकरे को शहीद कहे तो चलो ठीक है।
मेजर उन्नीकृष्णन तथा हवलदार गजेन्द्र सिंह जैसे वीरो ने लडते लडते मां भारती की लाज बचाने के लिए मौत को अपने गले लगा लिया था। उनके लिए मेरे जिस्म का रोआं रोआं कृतज्ञ है। मै मुंबई की आतंकी घटना मे शहीद हुए उन 19 बहादुर सिपाहियो के प्रति हार्दिक श्रद्धांजली अर्पित करता हुं।
Saturday, November 29, 2008
हेमंत करकरे की मौत का सत्य
हमारे यहां यह परम्परा रही है की मरने के बाद हम लोगों के गुण याद रखते हैं तथा अवगुणो को भुलने की कोशीश करते है । हेमंत करकरे को मिडिया देश का नायक और शहीद बनाने पर तुली हुइ है । लेकिन यह बात समझनी होगी कि किसी
अफसर के लिए एक निर्दोष साध्वी के उपर झुठा आतंकवादका आरोप लगाकर तङ्ग करना आसान होता है । लेकिन जब असली दहशतगर्द आतंकवादी से सामना होता है तब आपकी बहादुरी की असली परीक्षा होती है ।
एक और बात गौर करने लायक है की हेमंत करकरे की मौत आतंकवादीयों से लडते हुए नही हुइ थी । वह ठीक उसी तरह मरे जीस तरह मुर्म्बई में पौने दो सौ आम शहरी मरे थें । एक कार में घुमते वक्त आतंकीयों ने इन पर हमला किया था
तथा इन की कार कब्जे मे कर उसी मे बैंठ आतंकीयों ने सैकडो लागो को मौत के घाट उतारा था । हेमंत करकरे ने कोई बहादुरी नही दिखाई और बिलकुल आम आदमी की तरह आतंकीयो पर विना किसी जबाबी हमले किए मारे गए। क्या इन्हे बहादुर शहीद कहना उचित है।
मेजर उन्नीकृष्णन तथा हवलदार गजेन्द्र सिंह ने लडते लडते मां भारती की लाज बचाने के लिए मौत को अपने गले लिया था। उनके लिए मेरा दिल का रोआं रोआं कृतज्ञ है।
अफसर के लिए एक निर्दोष साध्वी के उपर झुठा आतंकवादका आरोप लगाकर तङ्ग करना आसान होता है । लेकिन जब असली दहशतगर्द आतंकवादी से सामना होता है तब आपकी बहादुरी की असली परीक्षा होती है ।
एक और बात गौर करने लायक है की हेमंत करकरे की मौत आतंकवादीयों से लडते हुए नही हुइ थी । वह ठीक उसी तरह मरे जीस तरह मुर्म्बई में पौने दो सौ आम शहरी मरे थें । एक कार में घुमते वक्त आतंकीयों ने इन पर हमला किया था
तथा इन की कार कब्जे मे कर उसी मे बैंठ आतंकीयों ने सैकडो लागो को मौत के घाट उतारा था । हेमंत करकरे ने कोई बहादुरी नही दिखाई और बिलकुल आम आदमी की तरह आतंकीयो पर विना किसी जबाबी हमले किए मारे गए। क्या इन्हे बहादुर शहीद कहना उचित है।
मेजर उन्नीकृष्णन तथा हवलदार गजेन्द्र सिंह ने लडते लडते मां भारती की लाज बचाने के लिए मौत को अपने गले लिया था। उनके लिए मेरा दिल का रोआं रोआं कृतज्ञ है।
आतंकवाद के मुद्दे का राजनितीकरण क्यौ नही
आतंकवाद देश के सामने एक बडी चुनौती है । इस मुद्दे के राजनितीकरण से कांग्रेस चिन्तीत है । क्योकी विगत में वोट बैंक तथा तुष्टीकरण की राजनिती की वजह से हीं देश में जेहादी आतंकवाद को बढावा मिला है । आतंकवाद के मुद्दे मे खुद को सुरक्षित करने के लिए ही कांग्रेस ने हिन्दुओ पर झुट्ठे आरोप गढे थें। इस बात को हमें समझना होगा ।
सोनिया विश्व के सबसे बडे आतंकी संगठन वेटीकन की अंग है
जिस प्रकार की घटना मुम्बई मे हुई। जितने बडे पैमाने पर हमला हुआ, जितना सटीक निशाना रहा उसे देख कर नही लगता की कोई भी आतंकी संगठन यह काम कर सकता है। निश्चित ही किसी शक्ति समपन्न देश के संगठीत खुफिया तंत्र के
रेख-देख मे ही यह काम हुआ होना चाहिए। बगैर किसी देश के आर्थिक और रणनितीक मदत के यह काम नही हो सकता है। मै तो कहता हुं की 5 आदमीयो का भी आतंकी समुह बगैर किसी देश के सरकारी आर्थिक मदत के नही बनाया जा सकता है।
मेरा कहने का तात्पर्य यह है की देश के सारे नक्सली, माओवादी एवम जेहादी संगठन किसी न किसी विदेशी ताकत के लिए काम कर रहे है।
कल टीवी पर महेश भट्ट कह रहे थे कि पाकिस्तान पर आरोप नही लगाया जाना चाहिए। अगर पाकिस्तान इन हमलो के पिच्छे नही है तो फिर किस देश की मदत से यह काम हुआ यह महेश भट्ट से पुछा जाना चाहिए। मै तो कहुंगा की महेश भट्ट
का भी नार्को टेष्ट कर के उनके आतंकीयो से सम्बन्ध के बारे मे जांच की जानी चाहिए। क्यो महेश भट्ट जैसे लोग आतंकी घटना के तुरंत बाद आतंकीयो और पाकिस्तान के समर्थन मे बयानबाजी शुरु कर देते है। हो सकता है की महेश
भट्ट ठीक हो, लेकिन उन्हे कहना होगा की अगर पाकिस्तान नही तो फिर कौन सा देश है भारत मे आतंकवाद के पीछे।
इस घटना मे भारत मे आतंकवाद निर्मुलण के लिए काम करने वाले कुछ महत्वपुर्ण व्यक्तियो की हत्या की गई है । जिस आर्टीकुलेटेड (सटीक) तरीके से हत्या की गई है उसे देख कर लगता है की उन लोग को एलीमीनेट (समाप्त)
करना ही इस हमले का उद्देश्य था। सम्भव है की उन जांबाज अधिकारीयो को आतंकवादीयो के बारे मे कोई बेहद महत्वपुर्ण सुचना हाथ लग गई थी। हो सकता है कि हिन्दु आतंकवादीयो के नाम से देश के दुश्मन देश मे हिन्दु-मुसलमानो
के बीच घृणा फैलाने का षडयंत्र कर रहे है यह आभास उन्हे हो चुका हो। अब उनके साथ ही वह महत्वपुर्णॅ राज भी सदा के लिए समाप्त हो गए होगे। देश के दुश्मन अपने योजना मे कामयाब हो गए और मुम्बई की सुरक्षा व्यवस्था धरी की
धरी रह गई।
घटना के बाद कोई छोटे मोटे आतंकवादी संगठन के नाम से कुछ मुसल्मान आतंकी पकडे जाएगे लेकिन मुझे लगता है की वह सब सत्य को छुपाने की एक कवायद भर है। जब हिन्दुओ के नाम से कोई किसी को मारता है तो शर्म से हिन्दुओ की
गरदन झुक जाती है। वैसे ही जब कोई मुसलमान किसी इनसान को मुसलमान के नाम से मारता है तो मुसलमान की भी गरदन झुकती है। तो कौन है इन हमलो के पीछे ?
क्या चर्च से संचालित शक्ति सम्पन्न देशो के खुफिया संगठनो ने इस घटना को अंजाम दिया है ? यह सोचने वाली बात है। इस लाइन पर अनुसंधान होना ही चाहिए। सोनिया गांधी सम्भवतः विश्व के सबसे बडे आतंकी संगठन वेटीकन की
अंग है। क्या भारत, पाकिस्तान सहित दक्षिण एसिया के मुलुक अब तक फिरंगीयो और उनके विभाजनकारी दुष्टताओ को समझ नही पाए हैं। भारत मे संप्रग सरकार स्थापना के बाद नेपाल को भारत अमेरिका और बिलायत की नजर से देखने लगा था और नतिजा हम देख रहे है। पुरे दक्षिण एसिया मे विभाजनकारी ताकतो का बोलबाला हो गया है।
जिन्ना और नेहरु बिलायती एजेंट थे। देश का विभाजन उन दोनो की वजह से हुआ था। गांधी देश का विभाजन नही चाहते थे। आज भी भारत में सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी विभाजनकारी शक्तियो का हीं प्रतिनिधीत्व करती है। सत्य सरल होते हुए भी हम नही देख पाते क्योकी हमारी समझ पर पर्दा डालने के लिए वे झुठे प्रचार करते है। झुठे प्रचार के लिए उन्होने कैयन तंत्र खडे कर रखे है। मिडीया उनके लिए यह काम कर रही है। जो वह चाहते है वही मिडीया दिखाती है। अतः अगर आप सत्य जानना चाहते है तो मिडीया के इंटेंसंस (नियत) का समझते हुए विश्लेषण करना सिखे।
रेख-देख मे ही यह काम हुआ होना चाहिए। बगैर किसी देश के आर्थिक और रणनितीक मदत के यह काम नही हो सकता है। मै तो कहता हुं की 5 आदमीयो का भी आतंकी समुह बगैर किसी देश के सरकारी आर्थिक मदत के नही बनाया जा सकता है।
मेरा कहने का तात्पर्य यह है की देश के सारे नक्सली, माओवादी एवम जेहादी संगठन किसी न किसी विदेशी ताकत के लिए काम कर रहे है।
कल टीवी पर महेश भट्ट कह रहे थे कि पाकिस्तान पर आरोप नही लगाया जाना चाहिए। अगर पाकिस्तान इन हमलो के पिच्छे नही है तो फिर किस देश की मदत से यह काम हुआ यह महेश भट्ट से पुछा जाना चाहिए। मै तो कहुंगा की महेश भट्ट
का भी नार्को टेष्ट कर के उनके आतंकीयो से सम्बन्ध के बारे मे जांच की जानी चाहिए। क्यो महेश भट्ट जैसे लोग आतंकी घटना के तुरंत बाद आतंकीयो और पाकिस्तान के समर्थन मे बयानबाजी शुरु कर देते है। हो सकता है की महेश
भट्ट ठीक हो, लेकिन उन्हे कहना होगा की अगर पाकिस्तान नही तो फिर कौन सा देश है भारत मे आतंकवाद के पीछे।
इस घटना मे भारत मे आतंकवाद निर्मुलण के लिए काम करने वाले कुछ महत्वपुर्ण व्यक्तियो की हत्या की गई है । जिस आर्टीकुलेटेड (सटीक) तरीके से हत्या की गई है उसे देख कर लगता है की उन लोग को एलीमीनेट (समाप्त)
करना ही इस हमले का उद्देश्य था। सम्भव है की उन जांबाज अधिकारीयो को आतंकवादीयो के बारे मे कोई बेहद महत्वपुर्ण सुचना हाथ लग गई थी। हो सकता है कि हिन्दु आतंकवादीयो के नाम से देश के दुश्मन देश मे हिन्दु-मुसलमानो
के बीच घृणा फैलाने का षडयंत्र कर रहे है यह आभास उन्हे हो चुका हो। अब उनके साथ ही वह महत्वपुर्णॅ राज भी सदा के लिए समाप्त हो गए होगे। देश के दुश्मन अपने योजना मे कामयाब हो गए और मुम्बई की सुरक्षा व्यवस्था धरी की
धरी रह गई।
घटना के बाद कोई छोटे मोटे आतंकवादी संगठन के नाम से कुछ मुसल्मान आतंकी पकडे जाएगे लेकिन मुझे लगता है की वह सब सत्य को छुपाने की एक कवायद भर है। जब हिन्दुओ के नाम से कोई किसी को मारता है तो शर्म से हिन्दुओ की
गरदन झुक जाती है। वैसे ही जब कोई मुसलमान किसी इनसान को मुसलमान के नाम से मारता है तो मुसलमान की भी गरदन झुकती है। तो कौन है इन हमलो के पीछे ?
क्या चर्च से संचालित शक्ति सम्पन्न देशो के खुफिया संगठनो ने इस घटना को अंजाम दिया है ? यह सोचने वाली बात है। इस लाइन पर अनुसंधान होना ही चाहिए। सोनिया गांधी सम्भवतः विश्व के सबसे बडे आतंकी संगठन वेटीकन की
अंग है। क्या भारत, पाकिस्तान सहित दक्षिण एसिया के मुलुक अब तक फिरंगीयो और उनके विभाजनकारी दुष्टताओ को समझ नही पाए हैं। भारत मे संप्रग सरकार स्थापना के बाद नेपाल को भारत अमेरिका और बिलायत की नजर से देखने लगा था और नतिजा हम देख रहे है। पुरे दक्षिण एसिया मे विभाजनकारी ताकतो का बोलबाला हो गया है।
जिन्ना और नेहरु बिलायती एजेंट थे। देश का विभाजन उन दोनो की वजह से हुआ था। गांधी देश का विभाजन नही चाहते थे। आज भी भारत में सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी विभाजनकारी शक्तियो का हीं प्रतिनिधीत्व करती है। सत्य सरल होते हुए भी हम नही देख पाते क्योकी हमारी समझ पर पर्दा डालने के लिए वे झुठे प्रचार करते है। झुठे प्रचार के लिए उन्होने कैयन तंत्र खडे कर रखे है। मिडीया उनके लिए यह काम कर रही है। जो वह चाहते है वही मिडीया दिखाती है। अतः अगर आप सत्य जानना चाहते है तो मिडीया के इंटेंसंस (नियत) का समझते हुए विश्लेषण करना सिखे।
आतंकीयो का मनोबल उंचा उठाने मे सोनिया और उसके वफादार मनमोहन का बहुत बडा हाथ
अमेरिका मे एक आतंकी हमला हुआ और उसके बाद भले हीं जेहादी अमेरिका को
दुश्मन नं. 1 मानते रहे लेकिन दुसरा हमला करने की हिम्मत नही जुटा सके।
लेकिन भारत मे हरेक महिने कोई नक्सली या जेहादी कोई न कोई दुर्घटना कराने
मे सफल हो जाते है। क्या कारण है इसका। आतंकीयो का मनोबल उंचा उठाने और
देशभक्तो को प्रताडीत करने मे सोनिया और उसके वफादार मनमोहन एवम शिवराज
का बहुत बडा हाथ है। शायद आतंकीयो को लगता है की भारत उनके ससुराल की तरह
है। शिवराज पाटिल और गृह राज्य मंत्री जायसवाल से तो वो अपने सालो की तरह
मोहब्बत करते है। और जब सालो का राज हो तो फिर डर काहे का ?
दुश्मन नं. 1 मानते रहे लेकिन दुसरा हमला करने की हिम्मत नही जुटा सके।
लेकिन भारत मे हरेक महिने कोई नक्सली या जेहादी कोई न कोई दुर्घटना कराने
मे सफल हो जाते है। क्या कारण है इसका। आतंकीयो का मनोबल उंचा उठाने और
देशभक्तो को प्रताडीत करने मे सोनिया और उसके वफादार मनमोहन एवम शिवराज
का बहुत बडा हाथ है। शायद आतंकीयो को लगता है की भारत उनके ससुराल की तरह
है। शिवराज पाटिल और गृह राज्य मंत्री जायसवाल से तो वो अपने सालो की तरह
मोहब्बत करते है। और जब सालो का राज हो तो फिर डर काहे का ?
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