सोनिया के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार और उसकी गुलाम मिडीया हिन्दु संगठनो पर आतंकवादी का बिल्ला चिपकाना के लिए हर संभव प्रयत्न कर रही है। लेकिन आईए वास्तविकता को समझने का प्रयास करें।
भारत में पिछले दश बर्षो में नक्सलियो ने हजारो बम बिष्फोट किए हैं, माओवादीयों ने हजारों को मौत के घाट उतारा हैं । वैसे ही जेहादियों ने भी उतनी ही तादाद में बिष्फोट तथा हत्याए कि हैं । अगर घटनाओं कि सूची बनाई जाए एक लम्बी सूची तयार हो जाएगी । लेकिन सरकारी जांच एजेन्सी कितनी घटनाओं मे अपराधीयों तक पहुच पायी या कमसे कम विधिवत जांच प्रक्रिया को आगे बढा पाई । यह एक जिज्ञासा का बिषय है।
जिस प्रकार मालेगाव बिष्फोट के मामले में ए.टी.एस. साक्ष्यों को जुटाने का संकेत दे रही है उसे देख कर लगता है की वह र्सवज्ञ है । मिडिया से प्राप्त जानकारी के आधार पर यह सन्देह होता है की एक सोचे समझे षडयन्त्र के तहत हिन्दु कार्यकर्ता एवमं संगठनों को फंसाया जा रहा है । कोई नक्सली बम से थाने को उडा देता है, रेले स्टेशन को उडा देता है तो सरकार की एजेंसीया कोई सबुत नही जुटाती है, कोई कारवाही नही करती है। जेहादी जब तब हिन्दुओ को निशाना बनाते है तो सरकार उन्हे न रोक पाती है । लेकिन साध्वी प्रज्ञा के मामले जांच प्रकृया ऐसे चल रही है जैसे एटीएस विश्व की सबसे कार्यकुशल एजेंसी है। धीरे धीरे एक एक जानकारी मिडीया को ऐसे लीक की जा रही है जैसे कोई जासुसी सिनेमा बनाया जा रहा हो। दिगविजय सिंह, आर.आर.पाटिल और विलासराव देशमुख ऐसे ईशारो मे बात करते वे हमलोग के अशोक कुमार हो।
अनेक प्रश्न ऐसे है जिनके उतर भविष्य के गर्भ में छुपे है। कोई भी योजनाकार अपनी मोटरसाईकिल का प्रयोग धमाके मे नही करेगा। जिस प्रकार की फोन ट्रांस्क्रीप्ट दी गई है वह सुनियोजित षडयंत्र (स्टींग अपरेशन) की तरह लगती है। ऐसा लगता है की किसी आस्थावान हिन्दु के निर्दोष वार्तालाप का प्रयोग उसे फंसाने के लिए किया जा रहा है। मुझे यह संदेह है की किसी विधर्मी विदेशी एजेंसी ने कुछ आस्थावान हिन्दुओ के बीच घुस कर बम विस्फोट किया और फिर उनके खिलाफ साक्ष्य जुटा कर शांतीप्रिय हिन्दु समाज को आतंकवादी सिद्ध करने की कवायद शुरु कर दी।
सिर्फ आतंकवाद ही हिन्दु मुक्ति का मार्ग नही है। और मै तो मुसल्मान भाईयो को अपना दुश्मन भी नही मानता। किंतु हम सब को अपने अपने ढंग से राष्ट्र रक्षा अभियान मे जुटना होगा। मै न तो संघ, ना भाजपा और ना ही विहीप का कार्यकर्ता हुं। हिन्दुओ को आत्मबल बनाए रखना होगा। मनोबल मे कोई ह्रास न आने पाए। ईतिहास के एक महत्वपुर्ण दोराहे पर हम खडे है। हमारा आज का निर्णय हमारे भविष्य के अस्तित्व से जुडा हुआ है। आज चुप रहने और हाथ पर हाथ धरे बैठने का अर्थ है मौत। उठो जागो ..........
कुछ दिनो से ब्लग के माध्यम से मै आप सब के बीच था। मै हिन्दी की औचारिक शिक्षा प्राप्त नही कर पाया था। लेकिन चिट्ठे पढते लिखते आप सभी की कृपा से कुछ आत्म विश्वास हासिल कर पाया इसके लिए मै सभी का आभारी हुं। लेकिन मेरी आत्मिक संवेदनशीलता और अपने पेशे की जरुरतो के कारण मेरे इस अंतिम चिट्ठे के साथ मै आपके बीच से बिदा होता हुं। कभी कही भुल चुक हुई हो या किसी का दिल दुखाया हो तो माफ करेगे। हरि ओम तत सत !!!
इतनी ऊँची इसकी चोटी कि सकल धरती का ताज यही। पर्वत-पहाड़ से भरी धरा पर केवल पर्वतराज यही। अंबर में सिर, पाताल चरण है । मन इसका गंगा का बचपन है। इस हिमालय की गोद मे बसा देश नेपाल । भारत और नेपाल के लोगो के बीच विशेष प्रकार के सम्बन्ध है । सरकारेँ या मिडिया इस विशेष प्रकार के रिश्ते को समझ पाने मे असमर्थ रही है । यह एक कोशिश है नेपाल की वास्तविकताओ को आप तक पहुँचाने की . . . . . . .
Saturday, November 8, 2008
Wednesday, November 5, 2008
ओबामा को बधाई
अमेरीकी लोक तंत्र का आधार मिडीया है। जिसने अच्छा मिडीया मेनेजमेंट किया
वह जीत गया। जिसके मिडीया कंसल्टेंट और ईभेंट मैनेजर ने उत्कृष्ट काम
किया उसे चुन लेगी अमेरिकी जनता अपने राष्ट्रपति के रुप में।
हमारे देश मे मुश्किल से 5 प्रतिशत जनता टीभी, अखबार या एफ.एम के जरिए
अपना विचार निर्माण करती है। इसलिए इस दृष्टी से हमारे यहा एक मजबुत
लोकतंत्र है। लेकिन विदेशी शक्ति सम्पन्न राष्ट्र अब हमारे यहां भी मिडीया
मे छदम निवेश बढा रहे है। तो हम यह मान सकते है की भविष्य मे हमारे यहां
भी वही जितेगा जिसकी मिडीया मे अच्छी पकड हो। जनता जाए भाड में।
जो भी हो, अमेरीकी जनता ने ओबामा को अपना मुखिया चुन लिया है। ओबामा अब
अमेरिका ही नही बल्कि सारे विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्ति बन गए है।
अमेरीकी लोग खुद को जितना भी उदार एवम आधुनिक दिखाने का प्रयास कर लेकिन
वास्तव मे वह बेहद दकियानुसी एवम फंडामेंटलिष्ट (कट्टर) होते है। अपने
ईतिहास मे अमेरीकी जनता ने आज तक किसी महिला या अश्वेत या गैर ईसाई को
अपना राष्ट्रपति नही चुना था। यह पहली बार है की कोई अश्वेत अमेरिका का
राष्ट्रपति चुना गया है। ओबामा को भी पुर्ण अश्वेत नही कहा जा सकता क्योकी उनकी
माता श्वेत अमेरीकी थी। ओबामा का लालन पालन उनकी नानी ने किया था जिनकी
विचारधारा का ओबामा पर गहरा प्रभाव है। चुनाव से चंद रोज पहले ही उनकी नानी
का देहांत हो गया था।
ओबामा के राष्ट्रपति बनने से दक्षिण एसिया के प्रति अमेरिकी नितीयो मे कोई बुनियादी
फरक आएगा या नही यह देखने वाली बात है। वैसे डेमोक्रेटीक पार्टी जिससे ओबामा
निर्वाचित हुए है, उसे भारत के प्रति सहानुभुति रखने वाला माना जाता है। लेकिन
नेता जिस पार्टी का भी हो दक्षिण एसिया मे द्वन्द बढाने मे अमेरिका की विशेष रुचि
रहती है। दक्षिण एसिया के राष्ट्रो को चाहिए की वह किसी के बहकावे मे न आ कर
अपनी समस्यायो का समाधान करे तथा आपसी भाईचारा और विश्वास बढाते हुए दक्षिण
एसिया मे शांति बनाए रखने का प्रयास करे। इसी मे सबका कल्याण है सबकी समृद्धी है।
आइए जाने हमारे नए अमेरीकी राष्ट्रपति ओबामा के बारे में :
अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल करने वाले
डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार बराक ओबामा के जीवन और उनके राजनीतिक
करियर के अहम पड़ाव-
जन्म - 4 अगस्त 1961, होनोलूलू, हवायी।पारिवारिक पृष्ठभूमि- कीनियाई मूल
के पिता बराक हुसैन ओबामा, अमेरिकी मूल की मां ऐन दुनहाम। 18 अक्टूबर
1992 को मिशेल रॉबिनसन से विवाह। दो बेटियां मालिया और साशा ।
धर्म- ईसाई, यूनाइटेड चर्च ऑफ क्राइस्ट।
शिक्षा-- कोलंबिया विश्वविद्यालय से स्नातक। हावार्ड लॉ स्कूल से आगे की
पढ़ाई। फरवरी 1990 में लॉ रिव्यू में पहले अश्वेत अध्यक्ष निर्वाचित।
राजनीतिक करियर- शिगागो में वर्ष 1991 में नागरिक अधिकारों के वकील के
रूप में सामाजिक कार्य। वर्ष 1992 में राष्ट्रपति चुनाव में बिल क्लिंटन
के लिए मतदाता पंजीकरण अभियान का कार्य। इलोनॉयस से सीनेट के लिए 1996,
1998 और 2002 में निर्वाचित।
जुलाई 2004 में डेमोक्रेटिक नेशनल कन्वेंशन में दिए भाषण से देश भर में
मिली पहचान।अमेरिकी सीनेट के लिए 2 नवंबर 2004 को निर्वाचित। देश के
पांचवें अफ्रीकन-अमेरिकन सीनेटर। 10 फरवरी 2007 को अमेरिकी राष्ट्रपति पद
की उम्मीदवारी का ऐलान।
आधिकारिक रूप से 3 जून 2008 को डेमोक्रेटिक पार्टी से नामंकन। 28 अगस्त
2008 को पार्टी की उम्मीदवारी स्वीकार की।'टाइम' पत्रिका द्वारा वर्ष
2005 में विश्व के 100 प्रभावशाली लोगों में शामिल बराक ओबामा ने 4 नवंबर
2008 को राष्ट्रपति चुनाव में जीत दर्ज की।
वह जीत गया। जिसके मिडीया कंसल्टेंट और ईभेंट मैनेजर ने उत्कृष्ट काम
किया उसे चुन लेगी अमेरिकी जनता अपने राष्ट्रपति के रुप में।
हमारे देश मे मुश्किल से 5 प्रतिशत जनता टीभी, अखबार या एफ.एम के जरिए
अपना विचार निर्माण करती है। इसलिए इस दृष्टी से हमारे यहा एक मजबुत
लोकतंत्र है। लेकिन विदेशी शक्ति सम्पन्न राष्ट्र अब हमारे यहां भी मिडीया
मे छदम निवेश बढा रहे है। तो हम यह मान सकते है की भविष्य मे हमारे यहां
भी वही जितेगा जिसकी मिडीया मे अच्छी पकड हो। जनता जाए भाड में।
जो भी हो, अमेरीकी जनता ने ओबामा को अपना मुखिया चुन लिया है। ओबामा अब
अमेरिका ही नही बल्कि सारे विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्ति बन गए है।
अमेरीकी लोग खुद को जितना भी उदार एवम आधुनिक दिखाने का प्रयास कर लेकिन
वास्तव मे वह बेहद दकियानुसी एवम फंडामेंटलिष्ट (कट्टर) होते है। अपने
ईतिहास मे अमेरीकी जनता ने आज तक किसी महिला या अश्वेत या गैर ईसाई को
अपना राष्ट्रपति नही चुना था। यह पहली बार है की कोई अश्वेत अमेरिका का
राष्ट्रपति चुना गया है। ओबामा को भी पुर्ण अश्वेत नही कहा जा सकता क्योकी उनकी
माता श्वेत अमेरीकी थी। ओबामा का लालन पालन उनकी नानी ने किया था जिनकी
विचारधारा का ओबामा पर गहरा प्रभाव है। चुनाव से चंद रोज पहले ही उनकी नानी
का देहांत हो गया था।
ओबामा के राष्ट्रपति बनने से दक्षिण एसिया के प्रति अमेरिकी नितीयो मे कोई बुनियादी
फरक आएगा या नही यह देखने वाली बात है। वैसे डेमोक्रेटीक पार्टी जिससे ओबामा
निर्वाचित हुए है, उसे भारत के प्रति सहानुभुति रखने वाला माना जाता है। लेकिन
नेता जिस पार्टी का भी हो दक्षिण एसिया मे द्वन्द बढाने मे अमेरिका की विशेष रुचि
रहती है। दक्षिण एसिया के राष्ट्रो को चाहिए की वह किसी के बहकावे मे न आ कर
अपनी समस्यायो का समाधान करे तथा आपसी भाईचारा और विश्वास बढाते हुए दक्षिण
एसिया मे शांति बनाए रखने का प्रयास करे। इसी मे सबका कल्याण है सबकी समृद्धी है।
आइए जाने हमारे नए अमेरीकी राष्ट्रपति ओबामा के बारे में :
अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल करने वाले
डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार बराक ओबामा के जीवन और उनके राजनीतिक
करियर के अहम पड़ाव-
जन्म - 4 अगस्त 1961, होनोलूलू, हवायी।पारिवारिक पृष्ठभूमि- कीनियाई मूल
के पिता बराक हुसैन ओबामा, अमेरिकी मूल की मां ऐन दुनहाम। 18 अक्टूबर
1992 को मिशेल रॉबिनसन से विवाह। दो बेटियां मालिया और साशा ।
धर्म- ईसाई, यूनाइटेड चर्च ऑफ क्राइस्ट।
शिक्षा-- कोलंबिया विश्वविद्यालय से स्नातक। हावार्ड लॉ स्कूल से आगे की
पढ़ाई। फरवरी 1990 में लॉ रिव्यू में पहले अश्वेत अध्यक्ष निर्वाचित।
राजनीतिक करियर- शिगागो में वर्ष 1991 में नागरिक अधिकारों के वकील के
रूप में सामाजिक कार्य। वर्ष 1992 में राष्ट्रपति चुनाव में बिल क्लिंटन
के लिए मतदाता पंजीकरण अभियान का कार्य। इलोनॉयस से सीनेट के लिए 1996,
1998 और 2002 में निर्वाचित।
जुलाई 2004 में डेमोक्रेटिक नेशनल कन्वेंशन में दिए भाषण से देश भर में
मिली पहचान।अमेरिकी सीनेट के लिए 2 नवंबर 2004 को निर्वाचित। देश के
पांचवें अफ्रीकन-अमेरिकन सीनेटर। 10 फरवरी 2007 को अमेरिकी राष्ट्रपति पद
की उम्मीदवारी का ऐलान।
आधिकारिक रूप से 3 जून 2008 को डेमोक्रेटिक पार्टी से नामंकन। 28 अगस्त
2008 को पार्टी की उम्मीदवारी स्वीकार की।'टाइम' पत्रिका द्वारा वर्ष
2005 में विश्व के 100 प्रभावशाली लोगों में शामिल बराक ओबामा ने 4 नवंबर
2008 को राष्ट्रपति चुनाव में जीत दर्ज की।
Tuesday, November 4, 2008
छठ के अवसर पर हार्दिक मंगलमय शुभकामना
ॐ
आदिदेव नमस्तुभयँ प्रसीद मम भास्कर ।
दिवाकर नमस्तुभ्यँ प्रभाकर नमोस्तुते ॥
पुजी ले चरण तोहार ऐ छठी मइया , दुखवा से करदअ उबार ऐ छठी मइया...
सुर्य उपासना के महान पर्व छठ के अवसर पर हार्दिक मंगलमय शुभकामना
छठ पर्व का एक भक्तीमय लोकगीत :
नरियवा जे फरेला घवद से
ओ पर सुगा मेड़राय
सुगवा के मरबो धनुष से
सुगा गिरे मुरझाय
रोवें सुगा के सुगनिया
सुगा काहे मारल जाए
रखियों हम छठ के बरतिया
आदित होइहें सहाय
दीनानाथ होइहें सहाय
सूरूज बाबा होइहें सहाय
आदिदेव नमस्तुभयँ प्रसीद मम भास्कर ।
दिवाकर नमस्तुभ्यँ प्रभाकर नमोस्तुते ॥
पुजी ले चरण तोहार ऐ छठी मइया , दुखवा से करदअ उबार ऐ छठी मइया...
सुर्य उपासना के महान पर्व छठ के अवसर पर हार्दिक मंगलमय शुभकामना
छठ पर्व का एक भक्तीमय लोकगीत :
नरियवा जे फरेला घवद से
ओ पर सुगा मेड़राय
सुगवा के मरबो धनुष से
सुगा गिरे मुरझाय
रोवें सुगा के सुगनिया
सुगा काहे मारल जाए
रखियों हम छठ के बरतिया
आदित होइहें सहाय
दीनानाथ होइहें सहाय
सूरूज बाबा होइहें सहाय
Saturday, November 1, 2008
कौन कहता है की राज ठाकरे दोषी है ?
महाराष्ट्र के डा. हेडगेवार देश की एकात्मकता के लिए काम करने वाले युगपुरुष थे। लेकिन उनके बारे मे शायद हीं कोई भी टीभी चैनल वाला सकरात्मक चीजे दिखाता है। आज दो हजार लोग सडक पर उतर कर भारतीयता के पक्ष और क्षेत्रवाद के विरोध मे नारे लगाए तो शायद हीं कोई भी टीभी चैनल वाला अपने प्राइम टाईम मे उसको प्रदर्शीत करेगा। लेकिन अगर कोई राज ठाकरे क्षेत्रवाद को बढावा देने वाली कोई भडकाउ बात करेगा तो टीभी चैनल वाले बार बार उसे दिखाएगे। फिर कोई नितीश, लालु या पासवान कुछ भडकाउ प्रतिकृया देगे तो फिर उसे भी उसी प्रकार बार बार दिखाया जाएगा।
आज देश की मिडीया मे विदेशी शक्तियो का बहुत बडा निवेश है। यह निवेश प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ से भी ज्यादा साम्राज्यवादी शक्तियो के हित पोषण के लिए किया गया है। विश्व मे भारत ही एक ऐसा विशाल भुखण्ड है जिसमे राष्ट्र बनने की सभी गुण विद्यमान हैं। विश्व शक्तियो के सामने भारत बडी चुनौती है। इस कारण शक्ति सम्पन्न राष्ट्र भारत मे क्षेत्रियता और भाषावाद को बढावा देना चाहते है। वह यह भी चाहते है की यहा हिन्दु और मुसल्मान आपस मे लडे। यही कारण है की मिडीया छद्म रुप से क्षेत्रियता और भाषावाद को बढावा देने वाली घटनाओ को ज्यादा से ज्यादा दिखाती है।
राज ठाकरे को महत्व न देना ही उसकी प्रवृती को नष्ट करने का सबसे बढिया तरिका है। अतः राज ठाकरे और उसकी बातो पर प्रतिकृया देने वालो की कम से कम चर्चा की जानी चाहिए।
एक बात और, बिहार मे कानुन व्यवस्था तथा विकास के काम बिल्कुल ठप्प हो गए है। मतदान और राजनिती का आधार विकास न हो कर जातिवाद रह गया है। रोजगारी का सृजन ठप्प पड चुका है। लोगो ने शासन के लिए गलत लोगो का चुनाव किया था तो यह सब भुगतना हीं था। आज बिहारी जनता को रोजगार के लिए महाराष्ट्र-पंजाब और असम जाना पड रहा है तो इसके लिए सबसे बडा दोषी कौन है। मै इस स्थिती के लिए राज ठाकरे को कतई दोषी नही मानता। इस स्थिती के लिए बिहार की जनता और यहा के नेता ही सबसे बडे दोषी है। क्षेत्रिय विकास असंतुलन की वजह से इतनी बडी जंनसंख्या का दुसरे राज्य मे बस जाना की वहां के लोग खुद को अल्पसंख्यक महसुस करने लगे, इस बात की कोई राज ठाकरे चिता करता है तो राष्ट्रियता के नाम पर उसकी बात को खारीज नही किया जाना चाहिए। इस बात पर बहस होनी चाहिए की बिहार विकास के दौड मे क्यो पीछे छुट गया है और इसका दोष दुसरे के सिर मढने से काम नही चलेगा। बिहार की जनता और बिहार के नेताओ को संकल्प लेना चाहिए की वे दुसरे राज्यो मे बोझ नही बनेगे बल्कि खुद बिहार को विकास के मार्ग पर आगे बढाएंगे।
आज देश की मिडीया मे विदेशी शक्तियो का बहुत बडा निवेश है। यह निवेश प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ से भी ज्यादा साम्राज्यवादी शक्तियो के हित पोषण के लिए किया गया है। विश्व मे भारत ही एक ऐसा विशाल भुखण्ड है जिसमे राष्ट्र बनने की सभी गुण विद्यमान हैं। विश्व शक्तियो के सामने भारत बडी चुनौती है। इस कारण शक्ति सम्पन्न राष्ट्र भारत मे क्षेत्रियता और भाषावाद को बढावा देना चाहते है। वह यह भी चाहते है की यहा हिन्दु और मुसल्मान आपस मे लडे। यही कारण है की मिडीया छद्म रुप से क्षेत्रियता और भाषावाद को बढावा देने वाली घटनाओ को ज्यादा से ज्यादा दिखाती है।
राज ठाकरे को महत्व न देना ही उसकी प्रवृती को नष्ट करने का सबसे बढिया तरिका है। अतः राज ठाकरे और उसकी बातो पर प्रतिकृया देने वालो की कम से कम चर्चा की जानी चाहिए।
एक बात और, बिहार मे कानुन व्यवस्था तथा विकास के काम बिल्कुल ठप्प हो गए है। मतदान और राजनिती का आधार विकास न हो कर जातिवाद रह गया है। रोजगारी का सृजन ठप्प पड चुका है। लोगो ने शासन के लिए गलत लोगो का चुनाव किया था तो यह सब भुगतना हीं था। आज बिहारी जनता को रोजगार के लिए महाराष्ट्र-पंजाब और असम जाना पड रहा है तो इसके लिए सबसे बडा दोषी कौन है। मै इस स्थिती के लिए राज ठाकरे को कतई दोषी नही मानता। इस स्थिती के लिए बिहार की जनता और यहा के नेता ही सबसे बडे दोषी है। क्षेत्रिय विकास असंतुलन की वजह से इतनी बडी जंनसंख्या का दुसरे राज्य मे बस जाना की वहां के लोग खुद को अल्पसंख्यक महसुस करने लगे, इस बात की कोई राज ठाकरे चिता करता है तो राष्ट्रियता के नाम पर उसकी बात को खारीज नही किया जाना चाहिए। इस बात पर बहस होनी चाहिए की बिहार विकास के दौड मे क्यो पीछे छुट गया है और इसका दोष दुसरे के सिर मढने से काम नही चलेगा। बिहार की जनता और बिहार के नेताओ को संकल्प लेना चाहिए की वे दुसरे राज्यो मे बोझ नही बनेगे बल्कि खुद बिहार को विकास के मार्ग पर आगे बढाएंगे।
Friday, October 17, 2008
क्या चर्च पर आक्रमण बन्द होने चाहिए ?
धर्म का एक मात्र उद्देश्य होता है। बेहतर विश्व बनाना और उच्चतर मानव निर्मित करना। भारतीय परम्पराओं मे धर्म को कभी सम्प्रदाय के रुप मे नही स्वीकारा गया। इसलिए हमारे धर्मिक शास्त्रो मे धर्म का कोई नाम नही दिया गया। वेद, पुराण और गीता मे कहीं भी "हिन्दु" शब्द का उल्लेख नही है। भारत मे धर्म का कोई संगठीत स्वरुप नही था। आत्मानुभुति से ही परम सत्य का साक्षात्कार हो सकता है ऐसी मान्यता रही है हमारी। हमारे यहां किसी व्यक्ति को ईश्वर-पुत्र या संवाददाता घोषित कर उसकी शरणागति से हीं मुक्ति मिलने जैसी बातो को कभी स्वीकार नही किया गया।
लेकिन जब धर्म एक सम्प्रदाय बना। जब इस दुनिया मे कुछ लोगो ने मिसिनरी लक्ष्य के साथ शासकों के सहयोग से धर्मांतरण कर अपने धर्मावलम्बियो की संख्या बढाने का काम शुरु किया तब धर्म सम्प्रदाय बन गया। इस अर्थ में ईसाइयत का प्रादुर्भाव विश्व के लिए सब से बडी दुर्घटना थी। जब ईसाईयत जैसे संगठीत धर्मो का आक्रमण सनातन एवं प्राक़ृतिक धर्मो पर होने लगा तो "हिन्दु" या "सनातन" धर्म जैसी शब्दावली प्रयोग मे आने लगी।
आज के विश्व मे जो शक्तिशाली राष्ट्र है वे चर्च के प्रभाव मे हैं। लेकिन उन देशो मे चर्च जाने वाले लोगो की संख्या दिन प्रतिदिन घट रही है। भारत, नेपाल, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, बंगलादेश जैसे देशो मे जहां गरीबी है वहां विदेशी धन से सेवा के नाम पर धर्मान्तरण करने का काम जोरो पर चल रहा है। इस धर्मांतरण का उद्देश्य बेहतर विश्व या उच्चतर मानव बनाना नही है, इनका उद्देश्य शक्तिशाली राष्ट्रो के हितो का पोषण करना भर है।
भारत मे वर्तमान शासन तंत्र के कारण चर्च खुद को शक्तिशाली समझने लगा और उसके गुर्गो ने कन्धमाल मे जनमाष्टमी के अवसर पर एक आश्रम पर आक्रमण कर स्वामी लक्ष्मानंद तथा उनके शिष्यो की हत्या कर दी। हालांकी सनातन धर्मावलम्बी बडे ही सहिष्णु एवं शांतीप्रिय होते है। लेकिन इस घटना ने सभी सनातन धर्मावलबीयो को उत्तेजित कर दिया। जिसके कारण भारत मे एकाध स्थानो पर छिटपुट घटनाओ मे चर्च पर आक्रमण भी हुए है। लेकिन मिडीया मे शक्तिशाली राष्ट्रो का बहुत बडा निवेश है। इस कारण मिडीया ने इन छोटी घटनाओ को बहुत बडे आक्रमण के रुप मे चित्रित कर हिन्दुओ पर संचार आक्रमण शुरु कर दिया है।
ऐसे मे हमे यह सोचना हीं होगा की हमे क्या रणनिती अपनानी है। हमे चर्चो के विरुद्ध हिंसा तो बन्द करनी चाहिए। लेकिन चर्च को अपने कुत्सित उद्देश्यो मे सफल न होने देने के लिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए।
लेकिन जब धर्म एक सम्प्रदाय बना। जब इस दुनिया मे कुछ लोगो ने मिसिनरी लक्ष्य के साथ शासकों के सहयोग से धर्मांतरण कर अपने धर्मावलम्बियो की संख्या बढाने का काम शुरु किया तब धर्म सम्प्रदाय बन गया। इस अर्थ में ईसाइयत का प्रादुर्भाव विश्व के लिए सब से बडी दुर्घटना थी। जब ईसाईयत जैसे संगठीत धर्मो का आक्रमण सनातन एवं प्राक़ृतिक धर्मो पर होने लगा तो "हिन्दु" या "सनातन" धर्म जैसी शब्दावली प्रयोग मे आने लगी।
आज के विश्व मे जो शक्तिशाली राष्ट्र है वे चर्च के प्रभाव मे हैं। लेकिन उन देशो मे चर्च जाने वाले लोगो की संख्या दिन प्रतिदिन घट रही है। भारत, नेपाल, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, बंगलादेश जैसे देशो मे जहां गरीबी है वहां विदेशी धन से सेवा के नाम पर धर्मान्तरण करने का काम जोरो पर चल रहा है। इस धर्मांतरण का उद्देश्य बेहतर विश्व या उच्चतर मानव बनाना नही है, इनका उद्देश्य शक्तिशाली राष्ट्रो के हितो का पोषण करना भर है।
भारत मे वर्तमान शासन तंत्र के कारण चर्च खुद को शक्तिशाली समझने लगा और उसके गुर्गो ने कन्धमाल मे जनमाष्टमी के अवसर पर एक आश्रम पर आक्रमण कर स्वामी लक्ष्मानंद तथा उनके शिष्यो की हत्या कर दी। हालांकी सनातन धर्मावलम्बी बडे ही सहिष्णु एवं शांतीप्रिय होते है। लेकिन इस घटना ने सभी सनातन धर्मावलबीयो को उत्तेजित कर दिया। जिसके कारण भारत मे एकाध स्थानो पर छिटपुट घटनाओ मे चर्च पर आक्रमण भी हुए है। लेकिन मिडीया मे शक्तिशाली राष्ट्रो का बहुत बडा निवेश है। इस कारण मिडीया ने इन छोटी घटनाओ को बहुत बडे आक्रमण के रुप मे चित्रित कर हिन्दुओ पर संचार आक्रमण शुरु कर दिया है।
ऐसे मे हमे यह सोचना हीं होगा की हमे क्या रणनिती अपनानी है। हमे चर्चो के विरुद्ध हिंसा तो बन्द करनी चाहिए। लेकिन चर्च को अपने कुत्सित उद्देश्यो मे सफल न होने देने के लिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए।
रुपये की हालत खराब
अमेरिका मुद्रा के तुलना में भारतीय रुपया लगातार गिर रहा है । कल, भारतीय रुपैया ४५ पैसा टुटकर प्रति डलर भा.रु. ४८/५३ पर बंद हुआ । व्यवहार में नेपाली रुपया भी भारतीय रुपये को आधार मान कर अन्य मुद्राओ से अपना अनुपात निश्चित करता है । इसलिए नेपाली रुपया का भी उसी अनुपात मे अवमुल्यन हुआ है । प्रति अमेरीकी डलर नेपाली रुपए का मुल्य आज ने.रु. ७८/७९ रहा । लेकिन बंगलादेश, पाकिस्तान तथा श्रीलंका मे अमेरीकी डलर का मुल्य पुर्व स्तर पर यथावत है । इसलिए भारत तथा नेपाल से इन देशो में हाने वाले निर्यात करीब २० प्रतिशत सस्ते हो जाएंगे । वैसे ही आयात २० प्रतिशत महंगें हो जाएंगें ।
दक्षिण एसिया की गरीबी में वैश्विक वित्तीय प्रणालीका बहुत बडा हाथ है । दक्षिण एसिया के देशों को यूरो के तर्ज पर समान मुद्रा बनाने पर विचार करना चाहिए ।
दक्षिण एसिया की गरीबी में वैश्विक वित्तीय प्रणालीका बहुत बडा हाथ है । दक्षिण एसिया के देशों को यूरो के तर्ज पर समान मुद्रा बनाने पर विचार करना चाहिए ।
Friday, October 3, 2008
अर्थोपनिषद -३
नेपाली ओर भारतीय जनता कमाती है और जो पैसा बचत होता है उसे सोना मे लगा देती है। सोना पुरी तरह अउत्पादनशील निवेश है। सोना मे निवेश का सिधा लाभ मिलता है साम्राज्यबादी शक्तियो को । क्योकीं सोना के खादानो पर उनका ही कब्जा है। क्यो नही एंक बार हम फिर साने पर प्रतिबन्ध लगांए । सारा सोना बेच डाले लण्डन बालो कों । उससे हमे प्राप्त होंगी ढेर सारे पुंजी और हम लगा सकेंगे उद्योग और सृजन कर सकेंगे ढेर सारी रोजगारी।
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