Tuesday, September 9, 2008

अर्थोपनिषद - १

आज विकास की परिभाषा है, ज्यादा से ज्यादा समान उत्पादन करना और ज्यादा से ज्यादा उपभोग करना । पश्चिमी देश या हमारे देश के शहरी लोग जो ज्यादा समान प्रयोग करते है उन्हे हम विकसित मानते है । मेरे दादा अपने समय में करीब ५० वस्तुए और सेवाओं का प्रयोग करते थें । उनमें से अधिकांश स्वदेशी होती थी । इतना ही नही अधिक वस्तुए तो अपने गांव के आसपास ही उत्पादित होती थी । आज मेरे यूग के लोग हजारो प्रकार की वस्तुए और सेवाओं का उपभोग कर रहे हैं, और वह भी अधिकांश विदेशीयों द्वारा उत्पादित हैं ।

एक जमाना था जब घर के पिछवाडे एक तुलसी का पौधा होता था । खांसी हुइ तो काढा पिया और स्वस्थ्य हो गए । अब हजारों प्रकार के रंगबिरंगे कफ सिरफ बजार में उपलब्ध है आपको ठीक करने के लिए । इस उपभोक्तावाद की दौड मे हम प्राकृतिक साधनो का भी आवश्यकता से अधिक दोहन कर रहे हैं, जो पर्यावरण के लिए खतरनाक सावित हो सक्ती है ।

एक किसान जो धान पैदा कर के १० रुपये में बेच रहा है, उसके जीवन यापन और इनपूट की लागत ही उससे ज्यादा है । दुसरी और १०० ग्राम का मोबाईल फोन जिसकी इनपूट लागत मुश्किल से २०० रुपये है, वह १०००० में खरिदते है हमलोग । तकनीकी सामान में मुल्य अभिवृद्धि सैकडो गुणा ज्यादा है, उसका सीधा लाभ सम्राज्यवादी देशों को प्राप्त हो रहा है ।

हम ऐसा विकास कर रहै है, जिसमें विलासिता के तकनीकी सामानो के लिए हमारे पैसे तकनिकी रुप से विकसित मुलुक लुट रहे है । कल तक स्वदेशी रेल से काम चलता था । अब विदेशी मशीन और इन्धन से चलने वाले हवाई यातायात को बढावा मिल रहा है । कल तक स्वदेशी विधुत मिलती थी । अब विदेशी मशीन और विदेशी इन्धन से उत्पादित बिजली का उपभोग करेंगे हम । यस कैसा विकास है । क्या हम अमेरिका और बिलायत के आर्थिक उपनिवेष बन चुके है।